राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनपीई), 1986/92 में सुस्पष्ट शिक्षा की भूमिका एवं सार इसको तैयार किए जाने के 25 वर्ष बाद भी सतत् रूप से प्रासंगिक है, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनपीई) में कहा गया :-
- हमारी राष्ट्रीय अवधारणा में शिक्षा सभी के लिए आवश्यक है, यह हमारे चहुमुखी विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- शिक्षा की संस्कृति के संदर्भ में भी भूमिका है। यह सवेंदनाओं एवं अवधारणाओंको परिष्कृत करती है, जो राष्ट्रीय लगाव, वैज्ञानिक प्रवृत्ति तथा बुद्धि एवं आत्म का का स्वतंत्रता में उल्लेखनीय योगदान प्रदान करती है – इस प्रकार समाजवाद, धमनिरपेक्षता तथा लोकतंत्र के लक्ष्यों को आगे बढाती है, जिन्हें हमारे संविधान में प्रतिष्ठापित किया गया है।
- शिक्षा अर्थव्यवस्था के विभिन्न स्तरों हेतु जनशक्ति का विकास करती है। यह एक ऐसी नीवं भी प्रदान करती है जिस पर अनुसंधान एवं विकास फलता-फुलता है, जो राष्ट्र की आत्म-निर्भरता की अंतिम गारंटी है।
- सार रूप में, शिक्षा वर्तमान एवं भविष्य का विशिष्ट निवेश है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का यही मुख्य सिद्धांत है।
वर्ष 2010 में राष्ट्र ने उस समय एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की जब अनुच्छेद 21-क तथा नि:शुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम (आरटीई), 2009 दिनांक 1 अप्रैल, 2010 से लागू किया गया। अनुच्छेद 21-क एवं आरटीई अधिनियम का प्रवर्तन सार्वभौमिक प्रारंभिक शिक्षा के लिए हमारे राष्ट्र के संघर्ष की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम को दर्शाता है। आरटीई अधिनियम को इस अवधारणा के साथ लागू किया गया है कि समानता, सामाजिक न्याय एवं लोकतंत्र के मूल्यों तथा न्यायपूर्ण एवं मानवीय सवेंदनाओं से परिपूर्ण समाज के सृजन के लक्ष्य को केवल सभी के लिए समावेशी प्रारंभिक शिक्षा के प्रावधान द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।
राष्ट्र की मानव संभावना का पूर्ण दोहन करने के लिए सभी को समान गुणवत्ता की शिक्षा प्रदान के दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए विभाग ने निम्नलिखित लक्ष्य निर्धारित किए है :-
- राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों की सहभागिता से शिक्षा के राष्ट्रीय एवं सम्पूर्णात्मक गुण को सुदृढ़ करना।
- सवैंधानिक मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध समाज का निर्माण करने के लिए स्कूल शिक्षा और साक्षरता की गुणवत्ता एवं मानकों में सुधार करना।
- शिक्षा का अधिकान अधिनियम के अंतर्गत प्रदत्त अधिकारों के अनुरूप प्रारंभिक शिक्षा का सार्वभौमिकरण।
- गुणवत्तापरक माध्यमिक शिक्षा हेतु अवसरों का सार्वभौमिकरण।
- एक पूर्ण साक्षर समाज की स्थापना करना।
इन लक्ष्यों को विभाग के निम्नलिखित मूल्य कार्यक्रमों के माध्यम से प्राप्त किया जाएगा :
- प्रारंभिक शिक्षा : सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए) एवं मध्याह्न भोजन (एमडीएम)
- माध्यमिक शिक्षा : राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (आरएमएसए), मॉडल स्कूल,
- व्यावसायिक शिक्षा, बालिका छात्रावास, विक्लांगों हेतु समावेशी शिक्षा, स्कूलों में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी।
- प्रौढ़ शिक्षा : साक्षर भारत
- अध्यापक शिक्षा : अध्यापक शिक्षा के सुदृढ़ीकरण हेतु योजना
- महिला शिक्षा : महिला समाख्या
- अल्पसंख्यक शिक्षा : मदरसों में गुणवत्तापरक शिक्षा प्रदान करने की योजना (एसपीक्यूईएम)
- अल्पसंख्यक संस्थाओं का अवसंरचना विकास (आईडीएमआई)
मिशन
विभाग प्रयास करता है :
- प्रारंभिक स्तर पर सभी बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना।
- शिक्षा के राष्ट्रीय एवं सम्पूर्णात्मक गुण को सुदृढ़ करने के लिए राज्यों एवं संघ राज्यों क्षेत्रों का सहयोग करना।
- गुणवत्तापरक स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता की सहायता से एक ऐसे समाज का निर्माण करना जो संवैधानिक मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध हो।
- गुणवत्तापरक माध्यमिक शिक्षा हेतु सार्वभौमिक अवसर प्रदान करना।
लक्ष्य
देश के प्रत्येक पात्र विद्यार्थी के लिए माध्यमिक शिक्षा के सपने को साकार करने के लिए विभाग के लक्ष्यों को सुस्पष्ट तौर पर निर्धारित किया गया है। इसके कार्य है :
- मौजूदा स्कूलों एवं नई संस्थाओं की स्थापना के माध्यम से स्कूलों के नेटवर्क को विस्तारित करते हुए गुणवत्तापरक माध्यमिक शिक्षा की सुलभता को बढ़ाना।
- अब तक वंचित रखे गए लाभवंचित समूहों एवं कमजोर वर्गों को शामिल करते हुए माध्यमिक शिक्षा प्रणाली में समानता लाना।
- मौजूदा संस्थाओं को सहायता प्रदान कर तथा नई संस्थाओं की स्थापना कर गुणवत्ता सुनिश्चित करना एवं शिक्षा के मानकों को सुधारना।
- सांस्थनिक एवं प्रणालीगत सुधारों के अर्थों में नीति स्तर के बदलाव प्रारंभ करना जिससे विश्व स्तरीय माध्यमिक शिक्षा पाठ्यक्रम को और बढ़ावा मिले जो बच्चों में प्रतिभा को सृजित कर सके।